दुनिया का सबसे बड़ा धन यह है।। जितना चाहे उतना ले सकते हो!!

  • न चोरहार्यं न च राजहार्यं
  • ना भातृभाज्यम न च भारकारी
  • व्यये कृते वर्धत एव नित्यं
  • विद्याधनं सर्वधनं प्रधानम


इस धन को ना तो कोई चुरा सकता है और ना ही इस धन पर किसी प्रकार का इनकम टैक्स देना पड़ता है ना ही यह धन भाइयों में बांटा जा सकता है और ना ही इस धन का किसी भी प्रकार का वजन है
इस धन को जितना भी खर्च किया जाए यह लगातार ही बढ़ता जाता है ऐसा विद्याधन सारे धनो में प्रधान धन माना गया है

हमारे शास्त्रों में विद्याधन का उल्लेख सब प्रकार के धन में सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह धन हमारे मन में होता है यह सब हमारे मस्तिष्क में होता है यह हमारे अंतर शरीर में होता है इसीलिए इस धन को कोई भी चुरा नहीं सकता
इस धन पर किसी भी प्रकार का इनकम टैक्स भी नहीं देना पड़ता यह थोड़ी हास्यास्पद बात है क्योंकि जो धन दिखाई ही नहीं दे रहा है उस धन पर किस प्रकार का कर (इनकम टैक्स) दिया जाए
परिवार में एक समय ऐसा आता है जब पिता को अपने धन का बंटवारा अपने पुत्रों में करना होता है लेकिन विद्याधन ऐसा धन है जिसने अपनी क्षमता अनुसार जितना भी अर्जित कर लिया वह सदा के लिए उसका ही होकर रह जाता है इसलिए जिस धन को भाइयों में भी बांटा नहीं जा सकता
विद्याधन ऐसा धन है जिसमें किसी प्रकार का भार भी नहीं होता
इस धन का सबसे बड़ा गुण है यही है कि इस धन को नित्य ही आप जितना भी खर्च करते हैं यह दुगना ती गुना होता जाता है
इसीलिए हमारे शास्त्रों में विद्या धन को सारे धनो प्रधान धन है 

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